MAA TRIPURA SUNDARI : BANSWARA (100 ISLANDS CITY)

 

मां त्रिपुरा सुंदरी मंदिर, बांसवाड़ा: विस्तृत जानकारी और रोचक कथाएँ

 

माँ त्रिपुरा सुंदरी | बांसवाड़ा 


स्थान, ऐतिहासिक महत्व और धार्मिक पृष्ठभूमि

मां त्रिपुरा सुंदरी मंदिर राजस्थान के बांसवाड़ा जिले से लगभग 14km दूर, तलवाड़ा गांव से 5km की दूरी पर उमराई गांव के समीप स्थित है। यह मंदिर घने हरियाली और अरावली पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में बसा है, जिसे “माताबाड़ी” भी कहा जाता है। इसे भारत के 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, जहां देवी सती के गाल का अंग गिरा था, इसलिए इसका धार्मिक महत्त्व अत्यंत है। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार मंदिर का अस्तित्व सम्राट कनिष्क (तीसरी सदी) के काल से पूर्व का है, और पंचाल समाज ने 16वीं सदी में इसका प्रमुख जीर्णोद्धार करवाया था।

मंदिर की अद्वितीय विशेषताएँ

मूर्ति का स्वरूप: मंदिर में स्थापित काले शिलाखंड की देवी की 18 भुजाओं वाली भव्य प्रतिमा अद्वितीय है। प्रत्येक भुजा में विभिन्न शास्त्र, स्त्र और आभूषण हैं, और देवी सिंह, मयूर व कमल पर विराजमान हैं। मूर्तिपीठ के नीचे श्री यंत्र का अंकन, विशेष तांत्रिक महत्त्व दर्शाता है।

त्रिरूप दर्शन: देवी त्रिपुरा सुंदरी की मान्यता है कि वे दिन में तीन बार—प्रातः कुमारी, दोपहर युवती और शाम वृद्धा के रूप में दर्शन देती हैं, इसी से उनका नाम पड़ा 'त्रिपुरा' (तीनों रूपों में सुंदर)।

ऐतिहासिक, लोककथाएँ और जनविश्वास पृष्ठभूमि

इतिहास के अनुसार, कभी यह स्थान तीन दुर्गों – शक्तिपुरी, शिवपुरी तथा विष्णुपुरी – से घिरा हुआ था और इन्हीं के कारण इसे त्रिपुरा सुंदरी का नाम मिला। इस मंदिर का अस्तित्व तीसरी शताब्दी के पहले से माना जाता है; यानि सम्राट कनिष्क के काल से पहले का है। बाद में 16वीं सदी में इसका जीर्णोद्धार हुआ था। इस स्थान पर पंचाल समाज द्वारा माता की पूजा एवं मंदिर का निर्माण करवाया गया था।

खनन और देवी की क्रोध कथा: मान्यता है कि प्राचीन काल में मंदिर के पास लोहे की खान थी। एक बार देवी भिखारिन के वेश में खान के द्वार पर आईं, लेकिन पंचाल समाज के लोगों ने उन्हें अनदेखा कर दिया। देवी ने क्रोध में आकर पूरी खान ध्वस्त कर दी, जिसमें कई लोग मारे गए। भयभीत पंचाल समाज ने देवी को प्रसन्न करने के लिए यह मंदिर और पास का तालाब बनवाया।

राजाओं से जुड़े प्रसंग: गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह, माता के परम भक्त थे — युद्ध पर जाते समय माँ से आशीर्वाद लेना आवश्यक मानते थे। मारवाड़ तथा मालवा के शासक भी यहां पूजा-अर्चना करते थे। एक कथा के अनुसार, मालवा के राजा जगदेस परमार ने युद्ध में हारने के बाद देवी के चरणों में सिर काट दिया। सिद्धराज जयसिंह की प्रार्थना पर देवी ने राजा को पुनर्जीवित कर दिया।

राजनीतिक आस्था का केन्द्र: यह मंदिर सत्ता-प्राप्ति और सफलता की कामना करने वाले नेताओं के बीच प्रसिद्ध है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने चुनाव गणना के दौरान यहीं रूक कर देवी का आशीर्वाद लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जैसी हस्तियाँ भी यहाँ पूजा के लिए आ चुकी हैं।

नवरात्रि और मेले: मंदिर में चैत्र और अश्विन नवरात्रि का भव्य आयोजन होता है। हजारों श्रद्धालु, विशेषकर महिलाएँ, गरबा व अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं। मंदिर परिसर में सुव्यवस्थित पार्किंग, जलव्यवस्था, आवास व भव्य प्रांगण भक्तों के लिए आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं।

मंदिर के इर्द-गिर्द खुदाई में मिले अवशेष

1982 में खुदाई के दौरान यहाँ शिव-पार्वती, ऋद्धि-सिद्धि, गणेश और कार्तिकेय की दुर्लभ मूर्तियाँ मिली थीं, जिससे यह स्थल पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

मां त्रिपुरा सुंदरी मंदिर, बांसवाड़ा केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, अपितु लोकजीवन, राजनीति, वास्तुकला और आस्थाओं का अभूतपूर्व संगम है। यहाँ की पौराणिक कथाएँ, लोककथाएँ और अद्वितीय दिव्यता हर भक्त और पर्यटक को बार-बार आकर्षित करती हैं।

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